अग्रिम जमानत समय की बाध्यता खत्म : सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) के मामले में बड़ी राहत दी है। बीते सप्ताह एक सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने अग्रिम जमानत के लिए समय की बाध्यता खत्म कर दी। जस्टिस अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने कहा कि अग्रिम जमानत के लिए किसी निश्चित समय सीमा का दायरा नहीं होना चाहिए। ये जमानत सुनवाई खत्म होने तक भी जारी रह सकती है।



क्या होती है जमानत?


अग्रिम जमानत से पहले हम ये जानते हैं कि जमानत का मतलब क्या होता है। दुनिया में सबसे विश्वसनीय कानून की डिक्शनरीज में से एक ब्लैक्स लॉ डिक्शनरी (Black’s Law Dictionary) के चौथे संस्करण में जमानत की परिभाषा है - 'अदालत द्वारा बताई गई जगह और समय पर उपस्थित होने का लिखित वचन (Undertaking) लेकर किसी शख्स को न्यायिक हिरासत से रिहा करना।'


क्या होती है अग्रिम जमानत?


सामान्य और अग्रिम जमानत में अंतर है। सामान्य जमानत उस शख्स को दी जाती है जिसकी गिरफ्तारी हो चुकी हो। जबकि अग्रिम जमानत में किसी शख्स को गिरफ्तारी से पहले ही रिहाई मिल जाती है।
दंड प्रक्रिया संहिता (Code of Criminal Procedure - CrPC) 1973 में अग्रिम जमानत का जिक्र है। इसकी धारा 438 की उप-धारा (1) में प्रावधान है कि - 'जब किसी शख्स के पास किसी गैर जमानती अपराध में गिरफ्तार होने का वैध कारण हो, उस परिस्थिति में वह उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय में अग्रिम जमानत के लिए अपील कर सकता है। अगर अदालत को उचित लगे, तो वह निर्देश दे सकती है कि संबंधित मामले में गिरफ्तारी की स्थिति आने पर वह शख्स जमानत पर छूट जाएगा।'
दंड प्रक्रिया संहिता(IPC) में किए गए प्रावधान के अनुसार, अग्रिम जमानत देने का अधिकार सिर्फ सत्र न्यायालय और उच्च न्यायालय के पास ही है।


इन शर्तों के साथ दी जा सकती है अग्रिम जमानत


अग्रिम जमानत की अपील स्वीकार करते समय उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय सीआरपीसी धारा 438 की उप-धारा (2) के अनुसार, ये शर्तें लागू कर सकता है -
जब भी पुलिस अधिकारी को जरूरत होगी, उस शख्स को पूछताछ के लिए उपस्थित होना होगा।
अदालत से अनुमति लिए बिना वह शख्स भारत छोड़कर कहीं नहीं जाएगा।
वह शख्स प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मामले से जुड़े किसी दूसरे व्यक्ति को पुलिस को सच बताने से रोकने के लिए से कोई वादा नहीं करेगा, उसे कोई लालच नहीं देगा, न ही किसी तरीके से धमकी देगा।


क्यों दी जाती है अग्रिम जमानत?


प्रक्रिया संहिता (CrPC) में अग्रिम जमानत का प्रावधान 1973 में जोड़ा गया, जब 1898 की पुरानी संहिता को बदला गया था। 1969 में 41वें विधि आयोग की रिपोर्ट में की गई सिफारिश के बाद ये प्रावधान जोड़ा गया था।
आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि - 'अग्रिम जमानत दिए जाने की जरूरत इसलिए है क्योंकि कई बार प्रभावशाली लोग खुद को बचाने के लिए अपने प्रतिद्वंद्वी को गलत मामलों में फंसा देते हैं। फर्जी मामलों के अलावा दूसरा वैध कारण है कि किसी अपराध में दोषी व्यक्ति हमेशा फरार होने या जमानत का गलत फायदा उठाने की ही कोशिश नहीं करता। इसलिए  उसे पहले हिरासत में लेकर, कुछ दिन जेल में रखकर फिर जमानत के लिए अपील करने का प्रावधान उचित साबित नहीं होता।'